मैंने लम्हों को पलों,
पलों को दिनों,
दिनों को सालों में बदलते देखा है |
मैंने चेहरे को मुस्कुराते,
मुस्कराहट को जूनून,
जूनून को रंजिश में बदलते देखा है |
मैंने मंज़िल को राहों,
राहों को पड़ावों,
पड़ावों को दूरी में बदलते देखा है |
मैंने लम्हों को पलों,
पलों को दिनों,
दिनों को सालों में बदलते देखा है |
मैंने ख्वाहिशों को उम्मीदों,
उम्मीदों को सपनो,
सपनो को फिर कांच सा भिखारते देखा है |
मैंने हाथों में लकीरों,
लकीरों को तकदीरों,
तकदीर को फिर हाथों से ही फिसलते देखा है |
मैंने लम्हों को पलों.....
मैंने खुद को उसमें,
उनको मुझ में,
कहीं छुपा सा देखा है |
मैंने आईने से पहले आँखों में अक्स देखा है |
मैंने हालात को बिगड़ते,
अपनों को गैरों में,
गैरों से चेहरो के नक़ाब गिरते देखा है |
ये जानता हूँ के मैं सब नहीं जानता,
तुम्हरी तरह शायद हर शह नहीं पहचानता,
कहने की बस इतनी सी बात है की,
कुछ मैंने भी देखा है |
मैंने लम्हों को पलों
पलों को दिनों
दिनों को सालों में बदलते देखा है |
पलों को दिनों,
दिनों को सालों में बदलते देखा है |
मैंने चेहरे को मुस्कुराते,
मुस्कराहट को जूनून,
जूनून को रंजिश में बदलते देखा है |
मैंने मंज़िल को राहों,
राहों को पड़ावों,
पड़ावों को दूरी में बदलते देखा है |
मैंने लम्हों को पलों,
पलों को दिनों,
दिनों को सालों में बदलते देखा है |
मैंने ख्वाहिशों को उम्मीदों,
उम्मीदों को सपनो,
सपनो को फिर कांच सा भिखारते देखा है |
मैंने हाथों में लकीरों,
लकीरों को तकदीरों,
तकदीर को फिर हाथों से ही फिसलते देखा है |
मैंने लम्हों को पलों.....
मैंने खुद को उसमें,
उनको मुझ में,
कहीं छुपा सा देखा है |
मैंने आईने से पहले आँखों में अक्स देखा है |
मैंने हालात को बिगड़ते,
अपनों को गैरों में,
गैरों से चेहरो के नक़ाब गिरते देखा है |
ये जानता हूँ के मैं सब नहीं जानता,
तुम्हरी तरह शायद हर शह नहीं पहचानता,
कहने की बस इतनी सी बात है की,
कुछ मैंने भी देखा है |
मैंने लम्हों को पलों
पलों को दिनों
दिनों को सालों में बदलते देखा है |