Wednesday, November 29, 2017

ये इकरार की कोई एक ज़ुबान है क्या ?

निगाहें, किताबें, हर्फ-ए-लफ़्ज़ों,
किस तौर से आखिर बयां होगी मोहब्बत ? 
ये इकरार की कोई एक ज़ुबान है क्या ? 

धूप, दीप, चिराग-ए-बत्तियों,

या ख़ुद को खाक कर होगी क़ुर्बत ?  
ये उजालों की कोई एक दुकान है क्या ? 

डर, झिझक, शर्म-ए-हया, 

इन्हीं में रेत सा क्या फिसल जाएगा लम्हा ? 
ये वक़्त क़ैद करने का कोई ज़रिया असान है क्या ? 

किस तौर से आखिर बयां होगी मोहब्बत ?

ये इकरार की कोई एक ज़ुबान है क्या ?

अधूरी भी खुद में ये पूरी ही है, 

मेरी कहानी मेरे लिए तोह ज़रूरी ही है। 
मेरे खत्म होने पर ये भी हो जाएगी आखिर।  
तुम अब अधूरी कहो तोह हां अधूरी ही है। 
पर, मेरे किस्से पर कभी और कर लेना गिले
तू बता, 
तेरी कहानी में कहीं मेरा नामो-निशान है क्या? 

निगाहें, किताबें, हर्फ-ए-लफ़्ज़ों,

किस तौर से आखिर बयां होगी मोहब्बत ?
ये इकरार की कोई एक ज़ुबान है क्या ?


झूटी उम्मीदों की कील पर मैं तांगे चल रहा हूँ ज़िंदगी,

बता तुझपे ही कोई सच्ची वजह है क्या?
मेरी तोह ज़मीं पर भी मिट गयी है हस्ती।
तेरे पास कोई आसमाँ है क्या?

जो एक रोज़ मुझसे छिन्ना ही था

उसका घम भी क्या मनाऊँ भला? 
पर फासलों के बढ़ने का, अब तुझे खौफ क्यूँ है? 
दूरीओं के बड़ने की और, गुंजाइश भी दरमियाँ है क्या?

मैं तोह आज गिर कल शायद फिर सँभल जाऊंगा, 
मेरी हालत पर तरस खा क्यूँ रुकने लगे हैं लोग? 
इन्हे अपने नसीब पर कोई गुमां है क्या ?  

न निगाहों, किताबों, न हर्फ-ए-लफ़्ज़ों,

तोह किस तौर से बयां होगी मोहब्बत? 
ये इकरार की कोई भी ज़ुबान है क्या? 
                                   
                                         

Friday, July 28, 2017

दिखावा करते हैं

मेरी मोहब्बत का जनाज़ा निकला है आज, 
आओ चलते हैं।
दुनिया के लिए ही सही, चलो दिखावा करते हैं। 

मेरे रेहनुमा बस तुम ही हो, 
सबको गुमां यूं है।। 

धोका ही तोह है।। 
आओ फिरसे करते हैं। 

      दुनिया के लिए ही सही, चलो दिखावा करते हैं।। 

क्या ही रक्खा है सही गलत में, 
सब बेकार का यह हो हल्ला है।

आखिर,, 
सच्चाई ही तोह है।। 
चलो झूठा साबित करते हैं। 

आँखें नीची क्यू कर निकलें। 
गुनाहगार साबित हम हुए कहाँ हैं? 

अरे,, 
इल्ज़ाम ही तोह है।। 
किसी और पर मढ़ते हैं।


      दुनिया के लिए ही सही, चलो दिखावा करते हैं।।

ये जो सभी सयाने बने बैठे हैं,
इनकी भी हालत हम सी ही है।
इन्ही से सीख कर आज,
इनकी ही आँखों में धूल भरते हैं।
जो सब कर रहे हैं,
हम तुम भी कर गुज़रते हैं।

       दुनिया के लिए ही सही, चलो दिखावा करते हैं।।


ये सारे सिद्धांत यूं ही धरे रह जाएंगे
इन्हे उन्ही सयानो संग रहने दो।।
कुछ चटक भी गए तोह गुनाह क्या है?? 
हम तुम काफिर बन पड़ते हैं।। 

शोर करीब आ रहा है सुनो।।
अब इस भीड़ में शामिल हो निकलते हैं।। 
 
ये मेरी ही, मोहब्बत का जनाज़ा निकला है आज,
आओ चलते हैं।
दुनिया के लिए ही सही, चलो दिखावा करते हैं।

Friday, July 14, 2017

चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ

छोड़ो ये दिखावे में तारीफें करना,
आओ हम भी कुछ सच कह जाएँ।
आज फिर एक बार ये दुनियादारी भुला,
चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ।

सब किससे पुराने संजो हमारे,
चलो यादों की एक पोटली बनाएं।
उसी में डाल देंगे सब शिकवे गिले,
चलो दूर कहीं फिर छोड़ उसको आएं।

पुराने ज़ख्मों को अब कुरेदना छोड़ो,
आओ नयी चोट अब दिल पे खाएं।
कब तक छुपाए रखेंगे आखिर ?
चलो अब फिर दिल से हम ज़नजीरें हटाएं।

चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ।

हम सोच सब पहले ही लेंगे,
क्यूँ बाद में हालआत को फिर गुनहगार बताएं?
लिख लेते हैं अभी से सवाल सारे,
चलो फिर बैठ इत्मीनान से जवाब बनाएं।

कुछ यूं करो इस बार,

तुम फेक दो वो सब कीताबें पुरानी,
जिनमें गलतियाँ दर्ज़ कर रक्खी थी मेरी।
हम क्यूँ कर अब उनका बोझा उठाएं ?
फिर शुरू से गिनती कर,
चलो गल्तीओं की नयी फैरिस्त बनाएं।

और इस बार कोई गलती न दोहराना,
चलो हम भी कुछ नई खताएं कर जाएं।
न हो सको तुम नाउम्मीद मुझसे,
चलो इस बार हम उम्मीदएं ही न लगाएं।

चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ I

अपनी पुरानी पहचान मिटा,
राब्ता हम तुम फिरसे बनाएं।
इस बार दूसरी ओर चलेंगे,
नए रास्तों पर चलो नयी ठोकरें खाएं।

कोई रश्क पुराना न लेके तुम दिल में चलना,
चलो नई नफरतों की अब नई दीवारें चढ़ाएँ।

छोड़ो ये दिखावे में तारीफें करना,
चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ ।
चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ ।

Tuesday, February 28, 2017

कुछ मैंने भी देखा है

मैंने लम्हों को पलों,
पलों को दिनों,
दिनों को सालों में बदलते देखा है |

मैंने चेहरे को मुस्कुराते,
मुस्कराहट को जूनून,
जूनून को रंजिश में बदलते देखा है |
मैंने मंज़िल को राहों,
राहों को पड़ावों,
पड़ावों को दूरी में बदलते देखा है |
   
           मैंने लम्हों को पलों,
               पलों को दिनों,
               दिनों को सालों में बदलते देखा है |
 
मैंने ख्वाहिशों को उम्मीदों,
उम्मीदों को सपनो,
सपनो को फिर कांच सा भिखारते देखा है |
मैंने हाथों में लकीरों,
लकीरों को तकदीरों,
तकदीर को फिर हाथों से ही फिसलते देखा है |

                     मैंने लम्हों को पलों.....


मैंने खुद को उसमें,
उनको मुझ में,
कहीं छुपा सा देखा है |
मैंने आईने से पहले आँखों में अक्स देखा है |

मैंने हालात को बिगड़ते,
अपनों को गैरों में,
गैरों से चेहरो के नक़ाब गिरते देखा है |

               
ये जानता हूँ के मैं सब नहीं जानता,
तुम्हरी तरह शायद हर शह नहीं पहचानता,
कहने की बस इतनी सी बात  है की,
कुछ मैंने भी देखा है |

         मैंने लम्हों को पलों
                पलों को दिनों
                दिनों को सालों में बदलते देखा है |

Sunday, January 8, 2017

आज फिर वह किस्सा, वह कहानी और वही बात है

आज फिर वह किस्सा, वह कहानी और वही बात है,
जिसे छोड़ पीछे दौड़े थे आगे,
फिर हो रही आज वही मुलाकात है,
दौड़ते दौड़ते फिर वहीँ आगये,
की जहा से यह शुरुवात है,
आज फिर वह किस्सा, वह कहानी और वही बात है|

दूसरी ही ओर निकला था मैं,
के इस बार दूसरा अंजाम हो|
जहां फिर न बस रास्ते में फस के रह जाऊं,
इस बार मंज़िल को मेरी पहचान हो|

पर,

मेरे कदमो तले घूमती ये दुनिया,
फिर ला उस मोड़ पे देगी,
जहा फिर वह लोग, वह भीड़ और वही नक़ाब ओड़े चेहरों की जमात है|

आज फिर वह किस्सा, वह कहानी और वही बात है...

फिर वह शोर, वह सन्नाटा और वही तन्हा सी रात है,
जहाँ फिर एक तरफ मैं और सामने खड़े जज़्बात हैं,
कुछ खुद में रोता मैं और मुझपे हस्ते ये हालात हैं |

कुछ नहीं बदला है आज भी,
थी तब भी बस एहि परछाई मेरी
आज भी बस यही मेरे साथ है

आज फिर वह किस्सा, वह कहानी और वही बात है,
जिसे छोड़ पीछे दौड़े थे आगे,
फिर हो रही आज वही मुलाकात है,
दौड़ते दौड़ते फिर वहीँ आगये,
की जहा से यह शुरुवात है