Friday, July 14, 2017

चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ

छोड़ो ये दिखावे में तारीफें करना,
आओ हम भी कुछ सच कह जाएँ।
आज फिर एक बार ये दुनियादारी भुला,
चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ।

सब किससे पुराने संजो हमारे,
चलो यादों की एक पोटली बनाएं।
उसी में डाल देंगे सब शिकवे गिले,
चलो दूर कहीं फिर छोड़ उसको आएं।

पुराने ज़ख्मों को अब कुरेदना छोड़ो,
आओ नयी चोट अब दिल पे खाएं।
कब तक छुपाए रखेंगे आखिर ?
चलो अब फिर दिल से हम ज़नजीरें हटाएं।

चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ।

हम सोच सब पहले ही लेंगे,
क्यूँ बाद में हालआत को फिर गुनहगार बताएं?
लिख लेते हैं अभी से सवाल सारे,
चलो फिर बैठ इत्मीनान से जवाब बनाएं।

कुछ यूं करो इस बार,

तुम फेक दो वो सब कीताबें पुरानी,
जिनमें गलतियाँ दर्ज़ कर रक्खी थी मेरी।
हम क्यूँ कर अब उनका बोझा उठाएं ?
फिर शुरू से गिनती कर,
चलो गल्तीओं की नयी फैरिस्त बनाएं।

और इस बार कोई गलती न दोहराना,
चलो हम भी कुछ नई खताएं कर जाएं।
न हो सको तुम नाउम्मीद मुझसे,
चलो इस बार हम उम्मीदएं ही न लगाएं।

चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ I

अपनी पुरानी पहचान मिटा,
राब्ता हम तुम फिरसे बनाएं।
इस बार दूसरी ओर चलेंगे,
नए रास्तों पर चलो नयी ठोकरें खाएं।

कोई रश्क पुराना न लेके तुम दिल में चलना,
चलो नई नफरतों की अब नई दीवारें चढ़ाएँ।

छोड़ो ये दिखावे में तारीफें करना,
चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ ।
चलो हम फिर अजनबी बन जाएँ ।