Sunday, December 18, 2016

पड़ाव काफी हैं

अभी इस कहानी में, आने पड़ाव काफी हैं,
इन पलकों के पीछे, छिपे ख्वाब काफी हैं |
कभी मिलेंगे तोह बतला भी देंगे,
बतलाने को अभी सवालो के जवाब काफी हैं |

गर सोच तुम ये चल दिए,
के किस्सा अपना बस इतना ही था |
जो पलट के झाँक लो तोह जान लोगे,
यकीन की आड़ में तुम्हें गुमान काफी हैं |

अभी इस कहानी में आने पड़ाव काफी हैं,
इन पलकों के पीछे छिपे ख्वाब काफी हैं |

चार दिन में ये सोच बैठे,
के सब कुछ सीख लिया हमने,,
पर,
तेरे आइना दिखलाने में भी देर न थी |

था गुरूर के हम भी सब समझते हैं,
जान गए हैं हम, आज भी हम अनजान काफी हैं |

अभी से क्या आखिर के सोचने लगे,
अभी तो आगाज़ बस हुआ ही था |
पर,
जो कहानी पे शक्क करने लगो तोह याद रखना,
इस किस्से की आज भी, पुरानी पहचान काफी है
कभी मिलेंगे तोह बतला भी देंगे
बतलाने को अभी सवालो के जवाब काफी हैं |

अभी इस कहानी में, आने पड़ाव काफी हैं,
इन पलकों के पीछे, छिपे ख्वाब काफी हैं |

Tuesday, November 29, 2016

इंसान नहीं हालात सही या गलत होते हैं

जब कभी बीते पलों को याद करता हूं,
तब समझ आता है,
                                    इंसान नहीं हालात सही या गलत होते हैं |

हम यूँ ही किसी के फैसले से खफा
न जाने कब तक गलतफहमियों का बोझ ढोते हैं,
काश उसी वक़्त समझ लेते हम कि,
                                    इंसान नहीं हालात सही या गलत होते हैं |


उसका हर कदम ज़रूरी नहीं,
मेरी ओर ही बड़े |
सफर जब ज़िन्दगी भर लंबा हो,
तोह कई बार रास्ते अलग होते हैं,
पर एक  रोज़ फिर मिल जाएंगी राहें,
क्योंकि
                                    इंसान नहीं हालात सही या गलत होते हैं |

फैसले इंसान के नहीं,
मजबूरी का अक्स होते हैं |
फैसले से फासलों के आने का डर,
हम न जाने क्यों मजबूरी में ढोते हैं
मजबूरी कि भी तोह वजह
सदा हालात होते हैं

इस सब में फसे हम कभी करीब,
तोह ग़ुमशुदा किसी वक़्त होते हैं ,

                                    इंसान नहीं हालात सही या गलत होते हैं |

गर समझ भी पहले लिया ये होता
शायद सुलझी हुई होती दुनिया
न बात के गलत मायने निकलते
न बीच सफर यूँ रस्ते बदलते
न परेशां होते अपनी
सचाई जताने कि ज़िद्द में यूँ,
जिस तरह बेचैन हम फ़क्त होते हैं

                                    इंसान नहीं हालात सही या गलत होते हैं |

Saturday, November 12, 2016

मनमर्ज़ियाँ

अब यूँ ही यादों की गिरह में नहीं रहता,
मैंने दिल को बेवक़ूफ़ बनाना सीख लिया |

मनमर्ज़ी कर ज़िद्दी भी था जो,
मैंने अपनी मनवाना सीख लिया |

जब भटकने भर लगता ही है,
बहला फुसला रस्ते पे लाना सीख लिया |

                           अब यूँ ही यादों की गिरह में नहीं रहता 
                           मैंने दिल को बेवक़ूफ़ बनाना सीख लिया 

बचपने में जो करने गलती लगे,
मैंने बड़प्पन से समझना सीख लिया |

बेपरवाही से जो कुछ करने में थी,
चंद लम्हो की वो ख़ुशी,
कीमत उसकी भी उतनी ही थी,
जिसे मैंने चुकाना सीख लिया |

जब दौड़ने की कोशिश में था,
मैंने रफ़्तार घटना सीख लिया,
क़दमों की रफ़्तार तोड़ कर,
मैंने कलम उठाना सीख लिया |

                             अब यूँ ही यादों की गिरह में नहीं रहता 
                             मैंने दिल को बेवक़ूफ़ बनाना सीख लिया 

ये चोट भी पहले से थी,
जो दर्द देती आज है,
दर्द ये पहले भी था,
मैंने बस जतलाना सीख लिया |


अब यूँ ही यादों की गिरह में नहीं रहता 
मैंने दिल को बेवक़ूफ़ बनाना सीख लिया 

Wednesday, February 24, 2016

मेरा बचपन मुझे बड़ा होने नहीं देता !!

हर बात पर एक पुरानी याद का वास्ता देता है मुझे,  
मेरा बचपन मुझे बड़ा होने नहीं देता !

न जाने कितने मौसम बदले , 
जाने क्यों लोग इतने बदल गए 
बदल गए हैं सब चेहरे भी अब 
न जाने सब नक़ाब कहा फिसल गए !

हर पल उन् पुराने चेहरों की हसीं 
मुस्कान मुझे भुलाने नहीं देता 
मेरा बचपन मुझे बड़ा होने नहीं देता !

कभी आँगन में गूंजती किलकारियां मेरी, 
कभी गलियारों में दौड़ते कदम, 
कभी झूला झूलने की ज़िद्द मेरी  
वो खेल खेलते लुका चुप्पी के हम !

जो स्वाद चीनी संग रोटी में था  
उसे बर्गर में तलाश रहा हु मैं  
जो सुकून मिटटी के बने मकानों में था  
वो इन ऊंची इमारतों में तलाश रहा हु मैं  
बारिश में कागज़ की कश्ती का मज़ा  
इन् पक्की सड़कों में नहीं  
बेफिक्री से जीने का मज़ा  
वीकेंड की पार्टी  में  नहीं 

हर एक याद कभी धुनधलाने नहीं देता  
मेरा बचपन मुझे बड़ा होने नहीं देता !

जीना आसान था उस उम्र में  
जब फ़िक्र सिर्फ homework की थी  
जब न whatsapp के मोहताज थे हम  
न ज़रूरत किसी selfie की थी 

जब दोस्तों के चेहरे देखना  
Facebook से ज़्यादा ख़ास था    
घूमने के लिए साइकिल थी अपनी  
रास्ता भी था छोटा, पहोचना भी पास था !

साथ जाने की ज़िद्द थी तब  
Check-in जब न सुना था हमने, 
फोटो खींचने पर स्माइल किया करते थे  
Pout तोह मछली को करते सुना था हमने 

पैसे की किल्लत में थी जो ऐश 
उसका लुत्फ़ ही कुछ और था  
सस्ती थी ज़रूरते भी हमारी 
न महंगाई का वो दौर था !

इन अनगिनत यादों का  एक  
गुलदस्ता कभी मुरझाने नहीं देता  
हर एक याद कभी धुनधलाने नहीं देता  


मेरा बचपन मुझे बड़ा होने नहीं देता !!!
मेरा बचपन मुझे बड़ा होने नहीं देता !!!