Tuesday, February 28, 2017

कुछ मैंने भी देखा है

मैंने लम्हों को पलों,
पलों को दिनों,
दिनों को सालों में बदलते देखा है |

मैंने चेहरे को मुस्कुराते,
मुस्कराहट को जूनून,
जूनून को रंजिश में बदलते देखा है |
मैंने मंज़िल को राहों,
राहों को पड़ावों,
पड़ावों को दूरी में बदलते देखा है |
   
           मैंने लम्हों को पलों,
               पलों को दिनों,
               दिनों को सालों में बदलते देखा है |
 
मैंने ख्वाहिशों को उम्मीदों,
उम्मीदों को सपनो,
सपनो को फिर कांच सा भिखारते देखा है |
मैंने हाथों में लकीरों,
लकीरों को तकदीरों,
तकदीर को फिर हाथों से ही फिसलते देखा है |

                     मैंने लम्हों को पलों.....


मैंने खुद को उसमें,
उनको मुझ में,
कहीं छुपा सा देखा है |
मैंने आईने से पहले आँखों में अक्स देखा है |

मैंने हालात को बिगड़ते,
अपनों को गैरों में,
गैरों से चेहरो के नक़ाब गिरते देखा है |

               
ये जानता हूँ के मैं सब नहीं जानता,
तुम्हरी तरह शायद हर शह नहीं पहचानता,
कहने की बस इतनी सी बात  है की,
कुछ मैंने भी देखा है |

         मैंने लम्हों को पलों
                पलों को दिनों
                दिनों को सालों में बदलते देखा है |

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