Sunday, March 29, 2015

उड़ान

उड़ने की कोशिश करता वो पंछी,  
बिलकुल मेरी तरह छटपटाता है, 
टूटे पंख घिसट घिसट कर, 
फिर उड़ान की हिम्मत जुटाता है,  
न जाने कितनी बार गिरा है, 
ये भूल फिर छलांग लगता है | 

उड़ने की कोशिश करता वो पंछी,  
बिलकुल मेरी तरह छटपटाता है ||

ये शांत सा लगता समंदर, 
जलती रे पर मेरे कदमो को जो सहलाता है, 
अंदर उतरते ही न जाने, 
क्यों उग्र सा हो जाता है ?  
क्यों बीच मझदार पा कर मुझे 
बाहर धकेलना चाहता है ? 
मैं ज़ोर लगाता हूं जितना, 
वो उतना ही मुझे थकाता है |

जैसे, कोई हवा का झोंका सा हो |

जो उस पंछी को तड़पाता है,
हवाओं से लड़ता झगड़ता,
वो उड़ने की आस लगाता है,

उड़ने की कोशिश करता वो पंछी,  
बिलकुल मेरी तरह छटपटाता है ||

गर पंख होते तो मैं भी कहीं, 
दूर उड़ जाता दुनिया से मेरी,
ये ख्याल कई बार आया है मुझे |

तोड़ ये पिंजरे झमेलों के सारे, 
दूर उड़ जाता दुनिया से मेरी, 
ये ख्याल कई बार आया है मुझे |

पर दर्द उसका भी तो बड़ा है,
पंख ले भी वो वही पड़ा है, 
थक गया है वो मुझ जैसे ही, 
पर वो भी मुझ जैसा ही ढीट बड़ा है |

टूटे रिश्तो से पंख लिए,
फिर एक बार वो मनन बनाता है, 
टूटे पंख घिसट घिसट कर,
फिर उड़ान की हिम्मत जुताडा है, 
न जाने कितनी बार गिरा है,
ये  भूल  फिर  छलांग  लगता  है |

उड़ने की कोशिश करता वो पंछी,  
बिलकुल मेरी तरह छटपटाता है ||

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