Saturday, December 5, 2015

ग़ुलाम

काश कभी ऐसा हो जाये ! 
मैं वक़्त का नहीं , 
वक़्त मेरा ग़ुलाम हो जाये ! 
मेरे चलने संग वो चलने लगे  
मेरे रुकने पे थम जाए .

हर मुश्किल कितनी आसान होगी 

गर हस्ती मेरी कुछ ऐसी हो जाये  
जो आज उसके इशारों पे थिरकती है ज़िन्दगी
वो खुद मेरे इशारों का ग़ुलाम होजाये 

मैं उठु तो सुबह की धूप भी खिलने लगे  

मेरी आँख लगते ही हसीं शाम होजाये !

सब कहते हैं वक़्त बलवान बड़ा हैं 

ये वक़्त ही है  जो सबकी राह में खड़ा हैं  

वो साथ हो तो हर बात बन पड़ती हैं 

वो बिगड़ जाये तो हर कदम पे लड़ा हैं | 

मैं सोचता हू ज़िन्दगी में कितना, 

मुझे सुकून-ए-आराम होजाये 
जो अपनी धुन पर नचाता है सबको 
उसकी, मेरी ताल को अगर सलाम होजाये  
जिसे सब कहते है बलवान बड़ा है  
उससे मेरी शख्सियत जो बलवान होजाये


काश कभी ऐसा हो जाये! 

मैं वक़्त का नहीं, 
वक़्त मेरा ग़ुलाम हो जाये!

No comments: