Saturday, November 12, 2016

मनमर्ज़ियाँ

अब यूँ ही यादों की गिरह में नहीं रहता,
मैंने दिल को बेवक़ूफ़ बनाना सीख लिया |

मनमर्ज़ी कर ज़िद्दी भी था जो,
मैंने अपनी मनवाना सीख लिया |

जब भटकने भर लगता ही है,
बहला फुसला रस्ते पे लाना सीख लिया |

                           अब यूँ ही यादों की गिरह में नहीं रहता 
                           मैंने दिल को बेवक़ूफ़ बनाना सीख लिया 

बचपने में जो करने गलती लगे,
मैंने बड़प्पन से समझना सीख लिया |

बेपरवाही से जो कुछ करने में थी,
चंद लम्हो की वो ख़ुशी,
कीमत उसकी भी उतनी ही थी,
जिसे मैंने चुकाना सीख लिया |

जब दौड़ने की कोशिश में था,
मैंने रफ़्तार घटना सीख लिया,
क़दमों की रफ़्तार तोड़ कर,
मैंने कलम उठाना सीख लिया |

                             अब यूँ ही यादों की गिरह में नहीं रहता 
                             मैंने दिल को बेवक़ूफ़ बनाना सीख लिया 

ये चोट भी पहले से थी,
जो दर्द देती आज है,
दर्द ये पहले भी था,
मैंने बस जतलाना सीख लिया |


अब यूँ ही यादों की गिरह में नहीं रहता 
मैंने दिल को बेवक़ूफ़ बनाना सीख लिया